कांग्रेस को मिली संजीवनी

मंडी संसदीय सीट एवं फतेहपुर विधानसभा सीट के चुनाव स्थगित होना कांग्रेस के लिए संजीवनी से कम नहीं है। राहत तो भाजपा ने भी महसूस की है, लेकिन चुनाव आयोग के निर्णय ने मृतप्राय कांग्रेस को सांसे दी है। कारण यह कि भाजपा सरकार की सत्ता के अंतिम दौर में कांग्रेस की ढूबती नाव में कोई सवार नहीं होना चाहता था। मंडी संसदीय सीट के लिए तो कांग्रेस प्रत्याशी ढूंढना ही कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर थी। भाजपा ने मंडी के चेहरे, जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह को मंडी संसदीय सीट का प्रभारी नियुक्त कर अपनी राह आसान करने का प्रयास तो किया, लेकिन कलह में डूबी कांग्रेस को अपनी नाव पार करवाने के लिए मंडी में कोई चर्चित चेहरा नहीं मिला। गुटों में बटी कांग्रेस प्रभारी के स्थान पर पर्यवेक्षक नियुक्ति कर अपना काम चलाना चाहती थी। जो प्रभारी नियुक्त भी किए वह भी विवादित थे तथा गुटबाजी के करण उनका उलझना भी तय था। नियुक्त पर्यवक्षकों में किसी मंडी का नेता का न होना भी चर्चा का विषय रहा। मंशा यह भी थी कि मंडी से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ठाकुर कौल सिंह को चुनाव उतारा जाए। ऐसा कर कांग्रेस का एक नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में से एक कांटे को निकाल बाहर करना चाहता था। बावजूद इसके यदि ठाकुर कौल सिंह प्रत्याषी होते तो सुखराम परिवार परिवार उनके रास्ते का सबसे बड़ा कांटा साबित होता। भीतर की बात यह कि कभी मंडी संसदीय सीट पर कभी अपना एकाधिकार मानने वाले पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह को चुनावी मैदान में उतारने को तैयार न थे। टिकट यदि सुखराम परिवार को दिया जाता तो कांग्रेस में बिखराव का दौर संभव था। उनकी बजह से पिछले विधानसभा चुनावों में पराजित हो चुके कांग्रेस के नेता अब सुखराम परिवार को सहन करने के मूड में नहीं है। ऐसे में चुनाव का डाला जाना किसी संजीवनी से कम नहीं है क्योंकि कांग्रेस नेता मुकेश अग्निहोत्री आशा कुमारी तथा सुखविंदर सिंह सुक्खू मंडी से गुटों में बंटी कांग्रेस की नाव पार लगा पाते यह संभव नहीं था तथा इसका सीधा प्रभाव होने वाले विधानसभा चुनावों पर पढ़ना सुनिश्चित था।

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